सिद्ध-भत्ति

असरीरा जीव-घणा, उवजुत्ता दंसणे य णाणे य । सायारमणायारा, लक्खणमेयं तु सिद्धाणं ।। 1।। मुलुत्तर-पयडीणं, बंधोदय-सत्त-कम्म-उम्मुक्का । मंगल-भूदा सिद्धा, अट्ठ-गुणातीद-संसारा ।। 2 ।। अट्ठ-विह-कम्म-वियला, सीदीभूदा णिरंजणा णिच्चा । अट्ठ-गुणा किदकिच्चा, लोयग्ग-णिवासिणो सिद्धा ।। 3 ।। सिद्धा णट्ठट्ठ-मला, विसुद्ध-बुद्धी य लद्ध-सब्भावा । तिहुयण-सिर-सेहरया, पसीयंतु भडारया सव्वे ।। 4 ।। गमणागमण-विमुक्के, विहडिय-कम्मट्ठ-पयडि-संघाए...

एकीभाव स्तोत्र | Ekibhav Stotra

लगता जो एकीभाव को ही प्राप्त हो रहे, भव-भव में साथ चलकर दुःख के बीज वो रहे। हे नाथ ! कर्मबंध की है यह विशेषता, दुष्कर है जिन्हें दूर करना भी देवता।। हे जिनरवि ! हो जिसके हृदय आपकी भक्ति, होती है क्षीर्ण घोर कर्मबंध की शक्ति। फिर दूसरा संताप...

।। श्री पार्श्वनाथ चालीसा ।।

शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करुं प्रणाम | उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम | सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार | अहिच्छत्र और पार्श्व को, मन मन्दिर में धार ||   || चौपाई || पार्श्वनाथ जगत हितकारी, हो स्वामी तुम व्रत के धारी | सुर नर असुर करें तुम सेवा, तुम ही सब देवन के देवा | तुमसे करम शत्रु भी हारा, तुम कीना...

चालीसा : श्री मल्लिनाथ जी

मोहमल्ल मद मर्दन करते, मन्मथ दुर्ध्दर का मद हरते । धैर्य खडग से कर्म निवारे, बाल्यती को नमन हमारे ।। बिहार प्रान्त की मिथिला नगरी, राज्य करे कुम्भ काश्यप गोत्री । प्रभावती महारानी उनकी, वर्षा होती थी रत्नो की ।।   अपराजित विमान को तज कर, जननी उदार बसे प्रभु आकर । मंगसिर शुक्ल एकादशी शुभ दिन, जन्मे तीन ज्ञान युक्त श्री जिन ।।   पूनम चन्द्र समान हो शोभित, इंद्र न्वहन करते हो मोहित । तांडव नृत्य करे खुश हो कर, निरखे प्रभु को विस्मित हो कर ।।   बढे प्यार से मल्लि कुमार, तन की शोभा हुई अपार । पचपन सहस आयु प्रभुवर की, पच्चीस धनु अवगाहन वपु की ।।   देख पुत्र की योग्य अवस्था, पिता ब्याह की करें व्यवस्था । मिथिलापूरी को खूब सजाया, कन्या पक्ष सुनकर हर्षाया ।।   निज मन में करते प्रभु मंथन, हैं विवाह एक मीठा बंधन । विषय भोग रूपी ये कर्दम, आत्म ज्ञान के करदे दुर्गम ।।   नहीं आसक्त हुए विषयन में, हुए विरक्त गये प्रभु वन में । मंगसिर शुक्ल एकादशी पावन, स्वामी दीक्षा करते धारण ।।   दो दिन तक धरा उपवास, वन में ही फिर किया निवास । तीसरे दिन प्रभु करे निवास, नन्दिषेण नृप दे आहार ।।   पात्रदान से हर्षित हो कर, अचरज पाँच करे सुर आकर । मल्लिनाथ जो लौटे वन में, लीन हुए आतम चिंतन में ।।   आत्मशुद्धि का प्रबल प्रमाण, अल्प समय में उपजा ज्ञान । केवलज्ञानी हुए छः दिन में, घंटे बजने लगे स्वर्ग में ।।   समोशरण की रचना साजे, अन्तरिक्ष में प्रभु विराजे । विशाक्ष आदि अट्ठाईस गणधर, चालीस सहस थे ज्ञानी मुनिवर।।   पथिको को सत्पथ दिखलाया, शिवपुर का सनमार्ग दिखाया । औषधि शाष्त्र अभय आहार, दान बताये चार प्रकार ।।   पाँच समिति लब्धि पांच, पांचो पैताले हैं साँच । षट लेश्या जीव षटकाय, षट द्रव्य कहते समझाय ।।   सात तत्त्व का वर्णन करते, सात नरक सुन भविमन डरते । सातों ने को मन में धारे, उत्तम जन संदेह निवारे ।।   दीर्घ काल तक दिया उपदेश, वाणी में कटुता नहीं लेश । आयु रहने पर एक मास, शिखर सम्मेद पे करते वास ।।   योग निरोध का करते पालन, प्रतिमा योग करें प्रभु धारण । कर्म नाश्ता कीने जिनराई, तत्क्षण मुक्ति रमा परणाई ।।  ...

चालीसा : श्री अरहनाथ जी

श्री अरहनाथ जिनेन्द्र गुणाकर, ज्ञान दरस सुख बल रत्नाकर । कल्पवृक्ष सम सुख के सागर, पार हुए निज आतम ध्याकर ।।   अरहनाथ वसु अरि के नाशक, हुए हस्तिनापुर के शाषक । माँ मित्रसेना पिता सुदर्शन, चक्रवर्ती बन दिया दिग्दर्शन ।।   सहस चौरासी आयु प्रभु की, अवगाहना थी तीस धनुष की । वर्ण सुवर्ण समान था पीत, रोग शोक थे तुमसे भीत ।।   ब्याह हुआ जब प्रीत कुमार का, स्वपन हुआ साकार पिता का । राज्याभिषेक हुआ अरहजिन का, हुआ अभ्युदय चक्र रतन का ।।   एक दिन देखा शरद ऋतू में, मेघ विलीन हुए क्षण भर में । उदित हुआ वैराग्य ह्रदय में, लौकंतिक सुर आये पल में ।।   अरविन्द पुत्र को देकर राज, गए सहेतुक वन जिनराज । मंगसिर की दशमी उजियारी, परम दिगंबर दीक्षा धारी ।।   पंचमुश्ठी उखाड़े केश, तन से ममत्व रहा नहीं दलेश । नगर चक्रपुर गए पारण हित, पड्गाहे भूपति अपराजित ।।   परसुख शुद्दाहार कराये, पंचाशचर्य देव कराये । कठिन तपस्या करते वन में, लीन रहे आतम चिंतन में ।।   कार्तिक मास द्वादशी उज्जवल, प्रभु विराजे आम्र वृक्ष तल । अंतर ज्ञान ज्योति प्रगटाई, हुए केवली श्री जिनराई ।।   देव करे उत्सव अति भव्य, समोशरण की रचना दिव्य । सौलह वर्ष का मौन भंग कर, सप्तभंग जिनवाणी सुखकर ।।   चौदह गुणस्थान बत्ताए, मोह काय योग दर्शाये । सत्तावन आश्रय बतलाये, इतने ही संवर गिनवाये ।।   संवर हेतु समता लाओ, अनुप्रेक्षा द्वादश मन भाओ । हुए प्रबुद्ध सभी नर नारी, दीक्षा व्रत धारे बहु भारी ।। कुम्भार्प आदि गणधर तीस, अर्ध लक्ष थे सकल मुनीश । सत्यधर्म का हुआ प्रचार, दूर दूर तक हुआ विहार ।।   एक माह पहले निर्वेद, सहस मुनि संग गए सम्मेद । चैत्र कृष्ण एकादशी के दिन, मोक्ष गए श्री अरहनाथ जिन ।।   नाटक कूट को पूजे देव, कामदेव चक्री जिनदेव । जिनवर का लक्षण था मीन, धारो जैन धरम समीचीन ।।   प्राणी मात्र का जैन धरम हैं, जैन धर्म हो परम धर्म हैं । पंचेंद्रियों को जीते जो नर, जितेन्द्रिय वे बनाते जिनवर ।।   त्याग धर्म की महिमा गाई, त्याग से ही सब सुखी हो भाई । त्याग कर सके केवल मानव, हैं अक्षम सब देव और दानव ।।...

चालीसा : श्री शांतिनाथ जी

शांतिनाथ महाराज का, चालीसा सुखकार । मोक्ष प्राप्ति के ही लिए, कहूँ सुनो चितधार ।। चालीसा चालीस दिन तक, कह चालीस बार। बढे जगत सम्पन्न, सुमत अनुपम शुद्द विचार ।।   शांतिनाथ तुम शांतिनायक, पंचम चक्री जग सुखदायक । तुम्ही हो सौलवे तीर्थंकर, पूजे देव भूप सुर गणधर।।   पंचाचार गुणों के धारी, कर्म रहित आठो गुणकारी । तुमने मोक्ष का मार्ग दिखाया, निज गुण ज्ञान भानु प्रगटाया ।।   स्यादवाद विज्ञान उचारा, आप तिरेन औरन को तारा । ऐसे जिन को नमस्कार कर, चढू सुमत शांति नौका पर ।।   सुक्ष्म सी कुछ गाथा गाता, हस्तिनापुर जग विख्याता । विश्वसेन पितु, ऐरा माता, सुर तिहूँ काल रत्न वर्षाता ।।   साढ़े दस करोड़ नित गिरने, ऐरा माँ के आँगन भरते । पंद्रह माह तक हुई लुटाई, ले जा भर भर लोग लुगाई ।।   भादो बदी सप्तमी गर्भाते, उत्तम सौलह सपने आते । सुर चारो कायो के आये, नाटक गायन नृत्य दिखाये ।।   सेवा में जो रही देवियाँ, रखती माँ को खुश दिन रतिया । जन्म सेठ बदी चौदस के दिन, घंटे अनहद बजे गगन घन ।।   तीनो ज्ञान लोक सुखदाता, मंगल सकल गुण लाता । इन्द्र देव सुर सेवा करते, विद्या कला ज्ञान गुण बढ़ते ।।   अंग अंग सुन्दर मनमोहन, रत्न जडित तन वस्त्राभूषण । बल विक्रम यश वैभव काजा, जीते छहो खंडो के राजा ।।   न्याय वान दानी उपकारी, परजा हर्षित निर्भय सारी । दीन अनाथ दुखी नहीं कोई, होती उत्तम वस्तु सोई ।।   ऊँचे आप आठ सो गज थे, वदन स्वर्ण अरु चिन्ह हिरन थे । शक्ति ऐसी थी जिस्मानी, वरी हजार छयानवे रानी ।।   लाख चौरासी हाथी रथ थे, घोड़े कोड़ अठारह शुभ थे । सहस भूप के राजन, अरबों सेवा में सेवक जन ।।   तीन करोड़ थी सुन्दर गईया, इच्छा पूरण करे नव निधिया । चौदह रत्न व चक्र सुदर्शन, उत्तम भोग वस्तुए अनगिन ।।   थी अड़तालीस कोड़ ध्वजाये, कुंडल चन्द्र सूर्य सम छाये । अमृत गर्भ नाम का भोजन, लाजवाब ऊँचा सिंहासन ।।   लाखों मंदिर भवन सुसज्जित, नार सहित तुम जिनमे शोभित । जितना सुख था शांतिनाथ को, अनुभव होता ज्ञानवान को ।।...

चालीसा : श्री धर्मनाथ जी

उत्तम क्षमा अदि दस धर्म,प्रगटे मूर्तिमान श्रीधर्म । जग से हरण करे सन अधर्म, शाश्वत सुख दे प्रभु धर्म ।।   नगर रतनपुर के शासक थे, भूपति भानु प्रजा पालक थे। महादेवी सुव्रता अभिन्न, पुत्रा आभाव से रहती खिन्न ।।   प्राचेतस मुनि अवधिलीन, मत पिता को धीरज दीन । पुत्र तुम्हारे हो क्षेमंकर, जग में कहलाये तीर्थंकर ।।   धीरज हुआ दम्पति मन में, साधू वचन हो सत्य जगत में । मोह सुरम्य विमान को तजकर, जननी उदर बसे प्रभु आकर ।।   तत्क्षण सब देवों के परिकर, गर्भाकल्याणक करें खुश होकर । तेरस माघ मास उजियारी, जन्मे तीन ज्ञान के धारी ।।   तीन भुवन द्युति छाई न्यारी, सब ही जीवों को सुखकारी । माता को निंद्रा में सुलाकर, लिया शची ने गोद में आकर ।। मेरु पर अभिषेक कराया, धर्मनाथ शुभ नाम धराया । देख शिशु सौंदर्य अपार, किये इन्द्र ने नयन हजार ।।   बीता बचपन यौवन आया, अदभुत आकर्षक तन पाया । पिता ने तब युवराज बनाया, राज काज उनको समझाया ।। चित्र श्रृंगारवती का लेकर, दूत सभा में बैठा आकर । स्वयंवर हेतु निमंत्रण देकर, गया नाथ की स्वीकृति लेकर ।।   मित्र प्रभाकर को संग लेकर, कुण्डिनपुर को गए धर्मं वर । श्रृंगार वती ने वरा प्रभु को, पुष्पक यान पे आये घर को ।।   मात पिता करें हार्दिक प्यार, प्रजाजनों ने किया सत्कार । सर्वप्रिय था उनका शासन, निति सहित करते प्रजापालन ।।   उल्कापात देखकर एकदिन, भोग विमुख हो गए श्री जिन । सूत सुधर्म को सौप राज, शिविका में प्रभु गए विराज ।।   चलते संग सहस नृपराज, गए शालवन में जिनराज । शुक्ल त्रयोदशी माघ महीना, संध्या समय मुनि पदवी गहिना ।।   दो दिन रहे ध्यान में लीना, दिव्या दीप्ती धरे वस्त्र विहिना । तीसरे दिन हेतु आहार, पाटलीपुत्र का हुआ विहार ।।   अन्तराय बत्तीस निखार, धन्यसेन नृप दे आहार । मौन अवस्था रहती प्रभु की, कठिन तपस्या एक वर्ष की ।।   पूर्णमासी पौष मास की, अनुभूति हुई दिव्यभास की । चतुर्निकाय के सुरगण आये, उत्सव ज्ञान कल्याण मनाये ।।   समोशरण निर्माण कराये, अंतरिक्ष में प्रभु पधराये । निराक्षरी कल्याणी वाणी, कर्णपुटो से पीते प्राणी ।।   जीव जगत में जानो अनन्त, पुद्गल तो हैं अनन्तानन्त ।...

चालीसा : श्री विमलनाथ जी

सिद्ध अनंतानंत नमन कर, सरस्वती को मन में ध्याय । विमल प्रभु की विमल भक्ति कर, चरण कमल को शीश नवाय ।।   जय श्री विमलनाथ विमलेश, आठो कर्म किये निःशेष । कृत वर्मा के राज दुलारे, रानी जयश्यामा के प्यारे ।।   मंगलिक शुभ सपने सारे, जगजननी ने देखे न्यारे । शुक्ल चतुर्थी माघ मास की, जन्म जयंती विमलनाथ की ।।   जन्मोत्सव देवों ने मनाया, विमलप्रभु शुभ नाम धराया । मेरु पर अभिषेक कराया, गंधोदक श्रद्धा से लगाया ।।   वस्त्राभूषण दिव्य पहनाकर, मात पिता को सौपा आकर । साठ लाख वर्षायु प्रभु की, अवगाहना थी साठ धनुष की ।।   कंचन जैसी छवि प्रभु तन की, महिमा कैसे गाऊ में उनकी । बचपन बिता, यौवन आया, पिता ने राजतिलक करवाया ।।   चयन करो सुन्दर वधुओ का, आयोजन किया शुभ विवाह का । एक दिन देखि ओस घास पर, हिमकण देखे नयन प्रितीभर ।।   हुआ संसर्ग सूर्य रश्मि से, लुप्त हुए सब मोती जैसे । हो विश्वास प्रभु को कैसे, खड़े रहे वे चित्रलिखित से ।।   क्षणभंगुर हैं ये संसार, एक धर्म ही हैं बस सार । वैराग्य ह्रदय में समाया, छोड़े क्रोध मान और माया ।।   घर पहुचे अनमने से होकर, राजपाठ निज सूत को देकर । देवभई शिविका पर चढ़कर, गए सहेतुक वन में जिनवर ।।   माघ मास चतुर्थी कारी, नमः सिद्ध कह दीक्षा धारी । रचना समोशरण हितकार, दिव्य देशना हुई हितकार ।।   उपशम करके मिथ्यात्व का, अनुभव करलो निज आतम का । मिथ्यातम का होय निवारण, मिटे संसार भ्रमण का कारण ।।   बिन सम्यक्त्व के जप तप पूजन, निष्फल हैं सारे फल अर्चन । विषफल हैं विषयभोग सब, इनको त्यागो हेय जान अब ।।   द्रव्य भाव नो कमोदी से, भिन्न है आतम देव सभी से । निश्च्य करके निज आतम का, ध्यान करो तुम परमातम का ।।   ऐसी प्यारी हित की वाणी, सुनकर सुखी हुए सब प्राणी । दूर दूर तक हुआ विहार, किया सभी ने आत्मोद्धार ।।   मंदर आदि पचपन गणधर, अडसठ सहस दिगंबर मुनिवर । उम्र रही जब तीस दिनों की, जा पहुचे सम्मेदशिखर जी ।।   हुआ बाह्य वैभव परिहार, शेप कर्म बंधन निखार । आवागमन का कर संहार, प्रभु ने पाया मोक्षागार ।।...

चालीसा : श्री वासु पूज्य जी

वासु पूज्य महाराज का, चालीसा सुखकार । विनय प्रेम से बाँचिये, करके ध्यान विचार ।।   जय श्री वासुपूज्य सुखकारी, दीन दयाल बाल ब्रह्माचारी । अदभुत चम्पापुर रजधानी, धर्मी न्यायी ज्ञानी दानी ।।   वासु पूज्य यहाँ के राजा, करने राज काज निष्काजा । आपस में सब प्रेम बढ़ाने, बारह शुद्ध भावना भाते ।।   गऊ शेर आपस में मिलते, तीनो मौसम सुख में कटते । सब्जी फल घी दूध हो घर घर, आते जाते मुनि निरंतर ।।   वस्तु समय पर होती सारी, जहा न हो चोरी बीमारी । जिन मंदिर पर ध्वजा फहराए, घंटे घरनावल झान्नाये ।। शोभित अतिशय माय प्रतिमायें, मन वैराग्य देख छा जावे । पूजन दर्शन नवहन करावे, करते आरती दीप जलाये ।।   राग रागिनी गायन गायें, तरह तरह के साज बजायें। कोई अलौकिक नृत्य दिखावे, श्रावक भक्ति से भर जावें ।।   होती निश दिन शाष्त्र सभाए, पद्मासन करते स्वाध्याये । विषय कषाय पाप नसाये, संयम नियम विविएक सुहाये।।   रागद्वेष अभिमान नशाते, गृहस्थी त्यागी धर्म निभाते । मिटें परिग्रह सब तृष्नाये, अनेकांत दश धर्म रमायें ।।   छठ अषाढ़ बड़ी उर आये, विजया रानी भाग्य जगायें । सुन रानी से सुलह सुपने, राजा मन में लगे हरषने ।।   तीर्थंकर ले जन्म तुम्हारे, होंगे अब उद्धार हमारे । तीनो वक्त नित रत्न बरसते, विजया माँ के आँगन भरते ।।   साढ़े दस करोड़ थी गिनती, परजा अपनी झोली भरती । फागुन चौदस बदि जन्माये, सुरपति अदभुत जिन गुण गाये ।।   मति श्रुत अवधि ज्ञान भंडारी, चालीस गुण सब अतिशय धारी । नाटक तांडव नृत्य दिखाए, नव भाव प्रभु जी के दर्शाये ।।   पाण्डु शिला पर नव्हन कराये, वस्त्रभुषन वदन सजाये । सब जग उत्सव हर्ष मनाये, नारी नर सुर झुला झुलाये ।।   बीते सुख में दिन बचपन के, हुए अठारह लाख वर्ष के । आप बारहवे हो तीर्थंकर, भैसा चिन्ह आपका जिनवर ।।   धनुष पचास वदन केसरिया, निस्पृह पर उपकार करइया । दर्शन पूजा जप तप करते, आत्म चिंतवन में नित रमते ।।   गुरु मुनियों का आदर करते, पाप विषय भोगो से बचते । शादी अपनी नहीं कराई, हारे तात मात समझाई ।।  ...

चालीसा : श्री श्रेयांसनाथ जी

निज मन में करके स्थापित, पंच परम परमेष्ठी को । लिखूं श्रेयांसनाथ चालीसा, मन में बहुत ही हर्षित हो ।।   जय श्रेयांसनाथ श्रुत ज्ञायक हो, जय उत्तम आश्रय दायक हो । माँ वेणु पिता विष्णु प्यारे, तुम सिंहपुर में अवतारे ।।   जय ज्येष्ठ कृष्ण षष्ठी प्यारी, शुभ रत्न वृष्टि होती भारी। जय गर्भकल्यानोत्सव अपार, सब देव करें नाना प्रकार ।।   जय जन्म जयंती प्रभु महान, फाल्गुन एकादशी कृष्ण जान । जय जिनवर का जन्माभिषेक, शत अष्ट कलश से करे नेक ।।   शुभ नाम मिला श्रेयांसनाथ, जय सत्य परायण सद्यजात । निश्रेयस मार्ग के दर्शायक, जन्मे मति श्रुत अवधि धारक ।।   आयु चौरासी लक्ष प्रमाण, तन तुंग धनुष अस्सी महान । प्रभु वर्ण सुवर्ण सम्मान पीत, गए पूरब इक्कीस लक्ष बीत ।।   हुआ ब्याह महा मंगलकारी, सब सुख भोगे आनंदकारी । जब हुआ ऋतू का परिवर्तन, वैराग्य हुआ प्रभु को उत्पन्न ।।   दिया राजपाट सूत श्रेयस्कर, तजा मोह त्रिभुवन भास्कर । सुर लाए विमलप्रभा शिविका, उद्यान मनोहर नगरी का ।।   वह जा कर केश लोंच कीने, परिग्रह ब्रह्मन्तर तज दिने । गए शुद्ध शिला तल पर विराज, ऊपर रहा तुम्बुर वृक्ष साज ।।   किया ध्यान वह स्थिर हॊकर, हुआ ज्ञान मनः पर्यय सत्वर । हुए धन्य सिद्धार्थ नगर भूप, दिया पात्र दान जिनने अनूप ।।   महिमा अचिन्त्य हैं पात्र दान, सुर करते पंच अचरज महान । वन को तत्काल ही लौट गए, पुरे दो साल वे मौन रहे ।।   आई जब अमावस माघ मास, हुआ केवल ज्ञान सुप्रकाश । रचना शुभ समवशरण सुजान, करते धनदेव तुरंत आन ।।   प्रभु की दिव्य ध्वनि होती विकीर्ण, होता कर्मो का बांध क्षीर्ण । उत्सर्पिणी अवसर्पिणी विशाल, ऐसे दो भेद बताये काल ।।   एक सौ अड़तालीस बीत जाये, जब हुन्द अवसर्पिणी कहाय । सुखमा सुखमा हैं प्रथम काल, जिसमे सब जीव रहे खुशहाल ।।   दूजा दिखलाते सुखमा काल, तीजा सुखमा दुखमा सुकाल । चौथा सुखमा दुखमा सुजान, दुखमा हैं पंचम मान ।।   दुखमा दुखमा छट्टम महान, छट्टम छट्टा एक ही समान । यह काल परिणति ऐसी ही, होती भरत ऐरावत में ही ।।   रहे क्षेत्र विदेह में विध्यमान, बस काल चतुर्थ ही वर्तमान । सुन काल स्वरुप को जान लिया, भविजनो का कल्याण हुआ ।।...