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सिद्ध-भत्ति

असरीरा जीव-घणा, उवजुत्ता दंसणे य णाणे य । सायारमणायारा, लक्खणमेयं तु सिद्धाणं ।। 1।। मुलुत्तर-पयडीणं, बंधोदय-सत्त-कम्म-उम्मुक्का । मंगल-भूदा सिद्धा, अट्ठ-गुणातीद-संसारा ।। 2 ।। अट्ठ-विह-कम्म-वियला, सीदीभूदा णिरंजणा णिच्चा । अट्ठ-गुणा किदकिच्चा, लोयग्ग-णिवासिणो सिद्धा ।। 3 ।। सिद्धा णट्ठट्ठ-मला, विसुद्ध-बुद्धी य लद्ध-सब्भावा । तिहुयण-सिर-सेहरया, पसीयंतु भडारया सव्वे ।। 4 ।। गमणागमण-विमुक्के, विहडिय-कम्मट्ठ-पयडि-संघाए...

एकीभाव स्तोत्र | Ekibhav Stotra

लगता जो एकीभाव को ही प्राप्त हो रहे, भव-भव में साथ चलकर दुःख के बीज वो रहे। हे नाथ ! कर्मबंध की है यह विशेषता, दुष्कर है जिन्हें दूर करना भी देवता।। हे जिनरवि ! हो जिसके हृदय आपकी भक्ति, होती है क्षीर्ण घोर कर्मबंध की शक्ति। फिर दूसरा संताप...

चालीसा : श्री महावीर जी

शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करू प्रणाम ।उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम ।। सर्व साधू और सरस्वती, जिनमन्दिर सुखकार । महावीर भगवान् को मन मंदिर में धार।।   जय महावीर दयालु स्वामी, वीर प्रभु तुम जग में नामी। वर्धमान हैं नाम तुम्हारा, लगे ह्रदय को प्यारा प्यारा ।।   शांत छवि मन मोहिनी मूरत, शांत हंसिली सोहिनी सूरत। तुमने वेश दिगंबर धारा, करम शत्रु भी तुमसे हारा ।।   क्रोध मान वा लोभ भगाया माया ने तुमसे डर खाया । तू सर्वज्ञ सर्व का ज्ञाता, तुझको दुनिया से क्या नाता ।।   तुझमे नहीं राग वा द्वेष, वीतराग तू हित उपदेश । तेरा नाम जगत में सच्चा, जिसको जाने बच्चा बच्चा ।।   भुत प्रेत तुमसे भय खावे, व्यंतर राक्षस सब भाग जावे। महा व्याधि मारी न सतावे, अतिविकराल काल डर खावे।।   काला नाग होय फन धारी, या हो शेर भयंकर भारी । ना ही कोई बचाने वाला, स्वामी तुम ही करो प्रतिपाला ।।   अग्नि दावानल सुलग रही हो, तेज हवा से भड़क रही हो। नाम तुम्हारा सब दुख खोवे, आग एकदम ठंडी होवे ।।   हिंसामय था भारत सारा, तब तुमने लीना अवतारा । जन्म लिया कुंडलपुर नगरी, हुई सुखी तब जनता सगरी ।।   सिद्धार्थ जी पिता तुम्हारे, त्रिशाला की आँखों के तारे । छोड़ के सब झंझट संसारी, स्वामी हुए बाल ब्रम्हाचारी ।।   पंचम काल महा दुखदायी, चांदनपुर महिमा दिखलाई । टीले में अतिशय दिखलाया, एक गाय का दुध झराया ।।   सोच हुआ मन में ग्वाले के, पंहुचा एक फावड़ा लेके । सारा टीला खोद गिराया, तब तुमने दर्शन दिखलाया ।।   जोधराज को दुख ने घेरा, उसने नाम जपा जब तेरा । ठंडा हुआ तोप का गोला, तब सब ने जयकारा बोला ।।   मंत्री ने मंदिर बनवाया, राजा ने भी दरब लगाया । बड़ी धर्मशाला बनवाई, तुमको लाने की ठहराई ।।   तुमने तोड़ी बीसों गाडी, पहिया खिसका नहीं अगाडी । ग्वाले ने जब हाथ लगाया, फिर तो रथ चलता ही पाया ।।   पहले दिन बैसाख वदी के, रथ जाता है तीर नदी के । मीना गुजर सब ही आते, नाच कूद सब चित उमगाते ।।  ...

।। श्री पार्श्वनाथ चालीसा ।।

शीश नवा अरिहंत को, सिद्धन करुं प्रणाम | उपाध्याय आचार्य का ले सुखकारी नाम | सर्व साधु और सरस्वती, जिन मन्दिर सुखकार | अहिच्छत्र और पार्श्व को, मन मन्दिर में धार ||   || चौपाई || पार्श्वनाथ जगत हितकारी, हो स्वामी तुम व्रत के धारी | सुर नर असुर करें तुम सेवा, तुम ही सब देवन के देवा | तुमसे करम शत्रु भी हारा, तुम कीना...

चालीसा : श्री पार्श्वनाथ जी

(दोहा) बड़ागाँव अतिशय बड़ा, बनते बिगड़े काज । तीन लोक तीरथ नमहुँ, पार्श्व प्रभु महाराज ।।१।। आदि-चन्द्र-विमलेश-नमि, पारस-वीरा ध्याय । स्याद्वाद जिन-धर्म नमि, सुमति गुरु शिरनाय ।।२।। (मुक्त छन्द) भारत वसुधा पर वसु गुण सह, गुणिजन शाश्वत राज रहे । सबकल्याणक तीर्थ-मूर्ति सह, पंचपरम पद साज रहे ।।१।। खाण्डव वन...

चालीसा : श्री नेमिनाथ जी

श्री जिनवाणी शीश धार कर, सिद्ध परभू का करके ध्यान । लिखू नेमि चालीसा सुखकार, नेमी प्रभु की शरण में आन।।   समुन्द्र विजय यादव कुलराई, सौरिपुर रजधानी कहाई । शिवादेवी उनकी महारानी, षष्ठी कार्तिक शुक्ल बखानी ।।   सुख से शयन करें शैया पर, सपने देखे सौलह सुन्दर । तज विमान जयंत अवतारे, हुए मनोरथ पूरण सारे ।।   प्रतिदिन महल में रतन बरसते, यदुवंशी निज मन में हरषते । दिन षष्ठी सावन शुक्ल का, हुआ अभ्युदय पुत्र रतन का ।।   तिन लोक में आनद छाया, प्रभु को मेरु पर पधराश । न्वहन हेतु जल ले क्षीरसागर, मणियो के थे कलश मनोहर ।।   कर अभिषेक किया परनाम, अरिष्ट नेमि दिया शुभ नाम । शोभित तुमसे सत्य मराल, जीता तुमने काल कराल ।।   सहस अष्ट लक्षण सुलालाम, नील कमल सम वर्ण अभिराम । वज्र शारीर दस धनुष उतंग, लज्ज्ति तुम छवि देव अनंग ।।   चाचा ताऊ रहते साथ, नेमि कृष्ण चचेरे भ्रात । धरा जब यौवन जिनराई, राजुल के संघ हुई सगाई ।।   जूनागढ़ को चली बरात, छप्पन कोटि यादव साथ । सुना पशुओ का क्रंदन, तोडा मोर मुकुट और कंगन ।।   बाड़ा खोल दिया पशुओं का, धारा वेष दिगंबर मुनि का । कितना अद्भुत संयम मन में, ज्ञानी जन अनुभव करें मन में ।।   नौ नौ आंसू राजुल रोवे, बारम्बार मूर्छित होवे। फेंक दिया दुल्हन श्रृंगार, रो रो कर यों करे पुकार ।।   नौ भव की तोड़ी क्यों प्रीत, कैसी हैं ये धर्मं की रीत । नेमि दे उपदेश त्याग का, उमड़ा सागर वैराग्य का ।।   राजुल ने भी ले ली दीक्षा, हुई संयम उत्तीर्ण परीक्षा । दो दिन रह कर के निराहार, तीसरे दिन करे स्वामी विहार ।।   वरदत्त महीपति दे आहार, पंचाश्चार्य हुए सुखकार । रहे मौन छप्पन दिन तक, तपते रहे कठिनतम तप व्रत ।।   प्रतिपदा अश्विन उजियारी, हुए केवली प्रभु अविकारी । समोशरण की रचना करते, सुरगण ज्ञान की पूजा करते ।।   भवि जीवों के पुण्य प्रभाव से, दिव्या ध्वनि खिरती सदभाव से । जो भी होता हे आत्माज्ञ, वो ही होता हे सर्वज्ञ ।।   ज्ञानी निज आतम को निहारे, अज्ञानी पर्याय संवारे । हैं अदभुत वैरागी दृष्टि, स्वाश्रित हो तजते सब सृष्टि ।।...

चालीसा : श्री नमिनाथ जी

सतत पूज्यनीय भगवन, नमिनाथ जिन महिभावान । भक्त करें जो मन में ध्याय, पा जाते मुक्ति वरदान ।।   जय श्री नमिनाथ जिन स्वामी, वसु गुण मण्डित प्रभु प्रणमामि । मिथिला नगरी प्रान्त बिहार, श्री विजय राज्य करें हितकार ।।   विप्रा देवी महारानी थी, रूप गुणों की वो खानी थी । कृष्णाश्विन द्वितीय सुखदाता, षोडश स्वपन देखती माता।।   अपराजित विमान को तजकर, जननी उदर बसे प्रभु आकर । कृष्ण असाढ़ दशमी सुखकार, भूतल पर हुआ प्रभु अवतार ।।   आयु सहस दस वर्ष प्रभु की, धनु पंद्रह अव्गना उनकी । तरुण हुए जब राजकुमार, हुआ विवाह तब आनंदकार ।।   एक दिन भ्रमण करे उपवन में, वर्षा ऋतू में हर्षित मन में । नमस्कार करके दो देव, कारण कहने लगे स्वयमेव ।। ज्ञात हुआ की क्षेत्र विदेह में, भावी तीर्थंकर तुम जग में । देवों से सुन कर ये बात, राजमहल लोटें नमिनाथ ।।   सोच हुआ भव भव भ्रमण का, चिंतन करते रहे मोचन का । परम दिगंबर व्रत करू अर्जन, रत्नात्रय्धन करू उपार्जन ।।   सुप्रभ सूत को राज सौपकर, गाये चित्रवन में जिनवर । दशमी असाढ़ मास की कारी, साहस नृपति संग दीक्षा धारी ।।   दो दिन तक उपवास धारकर, आतम लीन हुए श्री प्रभुवर । तीसरे दिन जब किया विहार, भूप वीरपुर दे आहार।।   नौ वर्ष तक तप किया वन में, एक दिन मौली श्री तरु तल में । अनुभूति हुई दिव्याभास, शुक्ल एकादशी मंगसिर मास ।।   नमिनाथ हुए ज्ञान के सागर, ज्ञानोत्सव करते सुर आकर । समोशरण था सभा विभूषित, मानस्तम्भ थे चार सुशोभित ।।   हुआ मौन भंग दिव्य ध्वनि से, सब दुःख दूर हुए अवनि से । आत्म पदार्थ की सत्ता सिद्ध, करना तन में अहम् प्रसिद्द ।।   बाह्येंद्रियो में करण के द्वारा, अनुभव से करता स्वीकारा। पर परिणिति से ही यह जीव, चतुर्गति में भ्रमे सदीव ।।   रहे नरक सागर पर्यन्त, सहे भूख प्यास तिर्यंच । हुआ मनुज तो भी संक्लेश, देवों में भी इर्ष्या द्वेष ।।   नहीं सुखो का कही ठिकाना, सच्चा सुख तो मोक्ष में माना । मोक्ष गति का द्वार हैं एक, नरभव से ही पाए नेक ।।   सुन कर मगन हुए सब सुरगण, व्रत धारण करते श्रावक जन । हुआ विहार जहां भी प्रभु का, हुआ वहीँ कल्याण सभी का ।।  ...

चालीसा : श्री मुनिसुव्रत जी

अरिहंत सिद्ध आचार्य को करुं प्रणाम । उपाध्याय सर्वसाधू करते स्वपर कल्याण ।। जिनधर्म, जिनागम, जिनमंदिर पवित्र धाम । वीतराग की प्रतिमा को कोटि कोटि प्रणाम ।।   जय मुनिसुव्रत दया के सागर । नाम प्रभु का लोक उजागर ।। सुमित्रा राजा के तुम नन्दा । मां शामा की आंखो के चन्दा ।।   श्यामवर्ण मूरत प्रभू की प्यारी । गुणगान करें निशदिन नर नारी ।। मुनिसुव्रत जिन हो अन्तरयामी । श्रद्धा भाव सहित तुम्हें प्रणामी ।।   भक्ति आपकी जो निशदिन करता । पाप ताप भय संकट हरता ।। प्रभू; संकटमोचन नाम तुम्हारा । दीन दुखी जीवों का सहारा ।।   कोई दरिद्री या तन का रोगी । प्रभू दर्शन से होते हैं निरोगी ।। मिथ्या तिमिर भयो अति भारी । भव भव की बाधा हरो हमारी ।।   यह संसार महा दुख दाई । सुख नहीं यहां दुख की खाई ।। मोह जाल में फंसा है बंदा । काटो प्रभु भव भव का फंदा ।।   रोग शोक भय व्याधि मिटावो । भव सागर से पार लगावो ।। घिरा कर्म से चौरासी भटका । मोह माया बन्धन में अटका ।।   संयोग वियोग भव भव का नाता । राग द्वेष जग में भटकाता ।। हित मित प्रित प्रभू की वाणी । स्वपर कल्याण करें मुनि ध्यानी ।।   भव सागर बीच नाव हमारी । प्रभु पार करो यह विरद तिहारी ।। मन विवेक मेरा अब जागा । प्रभु दर्शन से कर्ममल भागा ।।   नाम आपका जपे जो भाई । लोका लोक सुख सम्पदा पाई ।। कृपा दृष्टी जब आपकी होवे । धन आरोग्य सुख समृधि पावे ।।   प्रभु चरणन में जो जो आवे । श्रद्धा भक्ति फल वांच्छित पावे ।। प्रभु आपका चमत्कार है न्यारा । संकट मोचन प्रभु नाम तुम्हारा ।।   सर्वज्ञ अनंत चतुष्टय के धारी । मन वच तन वंदना हमारी ।। सम्मेद शिखर से मोक्ष सिधारे । उद्धार करो मैं शरण तिहांरे ।।   महाराष्ट्र का पैठण तीर्थ । सुप्रसिद्ध यह अतिशय क्षेत्र ।। मनोज्ञ मन्दिर बना है भारी । वीतराग की प्रतिमा सुखकारी ।।   चतुर्थ कालीन मूर्ति है निराली । मुनिसुव्रत प्रभू की छवि है प्यारी ।। मानस्तंभ उत्तग की शोभा न्यारी । देखत गलत मान कषाय भारी ।।   मुनिसुव्रत शनिग्रह अधिष्ठाता । दुख संकट हरे देवे सुख साता ।। शनि अमावस की महिमा भारी । दूर दूर से आते नर नारी ।। मुनिसुव्रत दर्शन महा हितकारी । मन वच तन वंदना हमारी ।।   दोहाः सम्यक् श्रद्धा से चालीसा, चालीस दिन पढिये नर नार ।...

चालीसा : श्री मल्लिनाथ जी

मोहमल्ल मद मर्दन करते, मन्मथ दुर्ध्दर का मद हरते । धैर्य खडग से कर्म निवारे, बाल्यती को नमन हमारे ।। बिहार प्रान्त की मिथिला नगरी, राज्य करे कुम्भ काश्यप गोत्री । प्रभावती महारानी उनकी, वर्षा होती थी रत्नो की ।।   अपराजित विमान को तज कर, जननी उदार बसे प्रभु आकर । मंगसिर शुक्ल एकादशी शुभ दिन, जन्मे तीन ज्ञान युक्त श्री जिन ।।   पूनम चन्द्र समान हो शोभित, इंद्र न्वहन करते हो मोहित । तांडव नृत्य करे खुश हो कर, निरखे प्रभु को विस्मित हो कर ।।   बढे प्यार से मल्लि कुमार, तन की शोभा हुई अपार । पचपन सहस आयु प्रभुवर की, पच्चीस धनु अवगाहन वपु की ।।   देख पुत्र की योग्य अवस्था, पिता ब्याह की करें व्यवस्था । मिथिलापूरी को खूब सजाया, कन्या पक्ष सुनकर हर्षाया ।।   निज मन में करते प्रभु मंथन, हैं विवाह एक मीठा बंधन । विषय भोग रूपी ये कर्दम, आत्म ज्ञान के करदे दुर्गम ।।   नहीं आसक्त हुए विषयन में, हुए विरक्त गये प्रभु वन में । मंगसिर शुक्ल एकादशी पावन, स्वामी दीक्षा करते धारण ।।   दो दिन तक धरा उपवास, वन में ही फिर किया निवास । तीसरे दिन प्रभु करे निवास, नन्दिषेण नृप दे आहार ।।   पात्रदान से हर्षित हो कर, अचरज पाँच करे सुर आकर । मल्लिनाथ जो लौटे वन में, लीन हुए आतम चिंतन में ।।   आत्मशुद्धि का प्रबल प्रमाण, अल्प समय में उपजा ज्ञान । केवलज्ञानी हुए छः दिन में, घंटे बजने लगे स्वर्ग में ।।   समोशरण की रचना साजे, अन्तरिक्ष में प्रभु विराजे । विशाक्ष आदि अट्ठाईस गणधर, चालीस सहस थे ज्ञानी मुनिवर।।   पथिको को सत्पथ दिखलाया, शिवपुर का सनमार्ग दिखाया । औषधि शाष्त्र अभय आहार, दान बताये चार प्रकार ।।   पाँच समिति लब्धि पांच, पांचो पैताले हैं साँच । षट लेश्या जीव षटकाय, षट द्रव्य कहते समझाय ।।   सात तत्त्व का वर्णन करते, सात नरक सुन भविमन डरते । सातों ने को मन में धारे, उत्तम जन संदेह निवारे ।।   दीर्घ काल तक दिया उपदेश, वाणी में कटुता नहीं लेश । आयु रहने पर एक मास, शिखर सम्मेद पे करते वास ।।   योग निरोध का करते पालन, प्रतिमा योग करें प्रभु धारण । कर्म नाश्ता कीने जिनराई, तत्क्षण मुक्ति रमा परणाई ।।  ...

चालीसा : श्री अरहनाथ जी

श्री अरहनाथ जिनेन्द्र गुणाकर, ज्ञान दरस सुख बल रत्नाकर । कल्पवृक्ष सम सुख के सागर, पार हुए निज आतम ध्याकर ।।   अरहनाथ वसु अरि के नाशक, हुए हस्तिनापुर के शाषक । माँ मित्रसेना पिता सुदर्शन, चक्रवर्ती बन दिया दिग्दर्शन ।।   सहस चौरासी आयु प्रभु की, अवगाहना थी तीस धनुष की । वर्ण सुवर्ण समान था पीत, रोग शोक थे तुमसे भीत ।।   ब्याह हुआ जब प्रीत कुमार का, स्वपन हुआ साकार पिता का । राज्याभिषेक हुआ अरहजिन का, हुआ अभ्युदय चक्र रतन का ।।   एक दिन देखा शरद ऋतू में, मेघ विलीन हुए क्षण भर में । उदित हुआ वैराग्य ह्रदय में, लौकंतिक सुर आये पल में ।।   अरविन्द पुत्र को देकर राज, गए सहेतुक वन जिनराज । मंगसिर की दशमी उजियारी, परम दिगंबर दीक्षा धारी ।।   पंचमुश्ठी उखाड़े केश, तन से ममत्व रहा नहीं दलेश । नगर चक्रपुर गए पारण हित, पड्गाहे भूपति अपराजित ।।   परसुख शुद्दाहार कराये, पंचाशचर्य देव कराये । कठिन तपस्या करते वन में, लीन रहे आतम चिंतन में ।।   कार्तिक मास द्वादशी उज्जवल, प्रभु विराजे आम्र वृक्ष तल । अंतर ज्ञान ज्योति प्रगटाई, हुए केवली श्री जिनराई ।।   देव करे उत्सव अति भव्य, समोशरण की रचना दिव्य । सौलह वर्ष का मौन भंग कर, सप्तभंग जिनवाणी सुखकर ।।   चौदह गुणस्थान बत्ताए, मोह काय योग दर्शाये । सत्तावन आश्रय बतलाये, इतने ही संवर गिनवाये ।।   संवर हेतु समता लाओ, अनुप्रेक्षा द्वादश मन भाओ । हुए प्रबुद्ध सभी नर नारी, दीक्षा व्रत धारे बहु भारी ।। कुम्भार्प आदि गणधर तीस, अर्ध लक्ष थे सकल मुनीश । सत्यधर्म का हुआ प्रचार, दूर दूर तक हुआ विहार ।।   एक माह पहले निर्वेद, सहस मुनि संग गए सम्मेद । चैत्र कृष्ण एकादशी के दिन, मोक्ष गए श्री अरहनाथ जिन ।।   नाटक कूट को पूजे देव, कामदेव चक्री जिनदेव । जिनवर का लक्षण था मीन, धारो जैन धरम समीचीन ।।   प्राणी मात्र का जैन धरम हैं, जैन धर्म हो परम धर्म हैं । पंचेंद्रियों को जीते जो नर, जितेन्द्रिय वे बनाते जिनवर ।।   त्याग धर्म की महिमा गाई, त्याग से ही सब सुखी हो भाई । त्याग कर सके केवल मानव, हैं अक्षम सब देव और दानव ।।...