कल्याण-मन्दिरमुदारमवद्यभेदि , भीता-भयप्रदमनिन्दितमङ्-धिपद्मम्। संसार-सागर-निमज्जदशेषजंतु - पोतायमानमभिनम्य जिनेश्वरस्य॥ 1॥ यस्य स्वयं सुरगुरुर्गरिमाम्बुराशे:, स्तोत्रं सुविस्तृतमतिर्न विभुर्विधातुम्। तीर्थेश्वरस्य कमठस्मयधूमकेतोस् तस्याहमेष किल संस्तवनं करिष्ये॥ 2॥ सामान्यतोऽपि तव वर्णयितुं स्वरूप- मस्मादृशा: कथमधीश भवन्त्यधीशा:। धृष्टोऽपि कौशिकशिशुर्यदि वा दिवान्धो रूपं प्ररूपयति किं किल घर्मरश्मे: ॥ 3॥ मोहक्षयादनु-भवन्नपि नाथ मत्र्यो नूनं गुणान्गणयितुं न तव क्षमेत।...
दुःख हरण विनती : वृन्दावन दास
कविश्री वृन्दावन दास (शैर की लय में तथा और रागिनियों में भी बनती है।) श्रीपति जिनवर करुणायतनं, दु:खहरन तुम्हारा बाना है | मत मेरी बार अबार करो, मोहि देहु विमल कल्याना है || टेक || त्रैकालिक वस्तु प्रत्यक्ष लखो, तुमसों कछु बात न छाना है | मेरे उर आरत जो...
देव दर्शन स्तोत्र
दर्शनं देवदेवस्य, दर्शनं पापनाशनम्। दर्शनं स्वर्गसोपानं, दर्शनं मोक्षसाधनम्॥ १॥ दर्शनेन जिनेन्द्राणां, साधूनां वन्दनेन च। न तिष्ठति चिरं पापं, छिद्रहस्ते यथोदकम्॥ २॥ वीतराग - मुखं दृष्ट्वा, पद्मरागसमप्रभम्। नैकजन्मकृतं पापं, दर्शनेन विनश्यति॥ ३॥ दर्शनं जिनसूर्यस्य, संसार-ध्वान्तनाशनम्। बोधनं चित्तपद्मस्य, समस्तार्थ-प्रकाशनम्॥ ४॥ दर्शनं जिनचन्द्रस्य, सद्धर्मामृत-वर्षणम्। जन्म-दाहविनाशाय, वर्धनं सुखवारिधे:॥ ५॥ ...
भक्तामर स्तोत्र : पद्यानुवाद – मुनि श्री विमर्शसागरजी महाराज
भक्तामर स्तोत्र : पद्यानुवाद ( मुनि श्री विमर्शसागरजी महाराज) तर्ज- जीवन है पानी की बूँद... आदिनाथ स्तोत्र महान - जो नर गाये रे। घाति- अघाति-सब कर्म नशाये रे॥ आदिनाथ प्रभु गुण स्तवन - जो नर गाये रे। जीवन में उसके दु:ख ना रह पाये रे॥ भक्तामर नत मुकुट मणि,...
भक्तामर स्तोत्र भाषा
भक्तामर स्तोत्र भाषा (हेमचन्द) आदिपुरुष आदीश जिन, आदि सुविधि करतार। धरम-धुरंधर परमगुरु, नमों आदि अवतार॥ सुरनतमुकुट रतन छवि करैं, अंतर पापतिमिर सब हरैं। जिनपद वंदों मन वच काय,भवजलपतित उरधरनसहाय॥ 1॥ श्रुत पारग इंद्रादिक देव, जाकी थुति कीनी कर सेव। शब्द मनोहर अरथ विशाल, तिस प्रभु की वरनों...
भक्तामर-स्तोत्र (संस्कृत) || BHAKTAMAR STOTRA (SANSKRIT)
भक्तामर - प्रणत - मौलि - मणि -प्रभाणा- मुद्योतकं दलित - पाप - तमो - वितानम्। सम्यक् -प्रणम्य जिन - पाद - युगं युगादा- वालम्बनं भव - जले पततां जनानाम्।। 1॥ य: संस्तुत: सकल - वाङ् मय - तत्त्व-बोधा- दुद्भूत-बुद्धि - पटुभि: सुर - लोक - नाथै:। स्तोत्रैर्जगत्- त्रितय -...